home Children Corner डर के आगे जीत है – लघु कथा

डर के आगे जीत है – लघु कथा


“आदमी को जानवर भी डराता है, और कोई अन्य संकट भी | किसी का गुस्सा भी डराता है और किसी काम का बिगड़जाना भी | और इन सबसे ज्यादा डराता है डर | डर किसी को कितना डरा सकता है यह पता चलेगा इस कथा को पढ़कर जो मूलतः बांगला भाषा में लिखी गयी थी | इसे पढ़कर आप भी मानने लंगेंगे कि डर के आगे जीत है”

हारू बाबू शाम के समय स्टेशन से घर आ रहे थे | उनका घर स्टेशन से आधा किलोमीटर था | शाम करीब-करीब ढल चुकी थी | हारू बाबु की चाल तेज हो गई | उनके एक हाथ में बैग था और दूसरे हाथ में छाता |

चलते हुए अचानक उन्हें लगा कि उनके पीछे – पीछे कोई आ रहा है | उन्होंने तिरछी नज़र से देखा वाकई कोई और भी उसी तरफ तेज कदमों से उनके पीछे चला आ रहा है |

हरु बाबू को लगा जैसे वह उनका पीछा कर रहा है | हरु बाबू यह सोचकर घबरा गए कि वह व्यक्ति चोर डाकू तो नहीं | वह इस खली मैदान में उन्हें अकेला पाकर कही वह दो चार लाठी ही न मार जाए |

हारू बाबू की बांस जैसी दुबली पतली टांगें काँपने लगीं | जब उन्हें कुछ नहीं सूझा तो वह किसी तरह लडखडाते हुए भागे |

उन्हें दोड़ते देखकर उनके पीछे दोड़ने लगा | हारू बाबू ने सोचा इस मैदान को इस तरह अकेले पार करना ठीक नहीं, बल्कि बड़ी सड़क से बैद्य टोला होकर, घूम कर जाना ही ठीक है | उस रास्ते से जाने पर कुछ ज्यादा चलना जरूर पड़ेगा, पर जान तो बचेगी |

वह झट से दाईं तरफ की गली से निकल कर बक्शी बाबू की बाड़ लाँघ कर दोड़ते हुए मुख्य सड़क पर जा पहुंचे |

हारू बाबू ने अपने छाते को शक्ति से पकड़ लिया | उन्होंने सोचा, अब भाग्य में जो लिखा है देखा जाएगा | जैसे ही बदमाश मेरे नजदीक आएगा इसी छाते से उसकी पिटाई कर दूंगा | हारू बाबू को याद आया कि वह बचपन में व्यायाम करते थे | उन्होंने अपनी बाँहों की मांसपेशियाँ फुलाकर देख ली कि वे अभी भी सख्त होती हैं या नहीं |

अब वह कालीबाड़ी के पास पहुँच चुके थे | मन्दिर के नजदीक पहुँचते ही हारू बाबू अचानक वहाँ उगी झाड़ियों के बीच से होकर जितनी तेजी से दोड़ सकते थे उतनी तेजी से दोड़ने लगे | पैरों की आवाज सुनकर पता चला कि उनके पीछे वाला व्यक्ति उनसे भी तेज दोड़ रहा था | अब तो उन्हें उसके डाकू होने के बारे में कोई संदेह नहीं रहा | हारू बाबू का दिल बड़ी तेजी से ढकने लगा | उनके माथे पर पसीने की बूँदें उभर आईं | अचानक उन्हें सामने के घाट पर बैठे कुछ लोग नजर आये, जो वह पर गप्पें लड़ा रहे थे |

उन्हें दूर से देखर उनकी आवाज सुनकर हारू बाबू के मन में साहस लौट आया, और उनके करीब जा कर अपने को सुरक्षित महसूस करने लगे, तब उन्होंने पलट कर अपना छाता तानते हुए सीना फुलाकर जोर से कहा, ” अब आ मेरे नजदीक, तुझे देखता हूँ | तू समझता होगा कि मुझे तेरी हरकतों का पता नहीं है अपना भला चाहता है तो  |”

मगर जब वह आदमी करीब आया तो उसका चेहरा देख कर उनका जोश अचानक ठण्डा पड़ गया | वह भी हारू बाबू जैसा ही दुबला पतला सा आदमी था | वह डाकू तो किसी तरह से लगता ही नहीं था |

हारू बाबू ने अपनी आवाज थोड़ी धीमी करके उसे डांटा, “जरा बता तो, तू इस तरह मेरा पीछा क्यों कर रहा है ?”

हारू बाबू को नाराज देखकर वह आदमी घबरा गया उसने किसी तरह अपना गला साफ़ करके कहा, “स्टेशन के बाबू ने ही मुझसे कहा था की आप बलराम बाबू के घर की बगल में रहते हैं, मुझे वही जाना है | मैने सोचा, मै आपके पीछे पीछे चलता रहूँ तो बलराम बाबू के घर पहुँच जाऊँगा | मगर बाबू जी, एक बात मेरी समझ में नहीं आई | आप क्या रोज इसी तरह उलटे सीधे रास्ते से कूदते फांदते हुए अपने घर जाते हैं ?”

हारू बाबू की समझ में नहीं आया की वह क्या कहें | सच बात कहने में उन्हें शर्म आ रही थी | उन्होंने उसकी बात का कोई जबाब नहीं दिया | बस, उस आदमी को साथ लेकर वह घर की और चल पड़े |

(लेखक: सुकमार रॉय)

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